||श्रीराम ||
ॐ नमोजि गणनायेका| सर्व सिद्धिफळदायेका |
अज्ञानभ्रांतिछेदका| बोधरूपा ||१||
माझिये अंतरीं भरावें| सर्वकाळ वास्तव्य करावें |
मज वाग्सुंन्यास वदवावें| कृपाकटाक्षेंकरूनी ||२||
तुझिये कृपेचेनि बळें| वितुळती भ्रांतीचीं पडळें |
आणी विश्वभक्षक काळें| दास्यत्व कीजे ||३||
येतां कृपेची निज उडी| विघ्नें कापती बापुडीं |
होऊन जाती देशधडी| नाममात्रें ||४||
म्हणौन नामें विघ्नहर| आम्हां अनाथांचे माहेर |
आदिकरूनी हरीहर| अमर वंदिती ||५||
वंदूनियां मंगळनिधी| कार्य करितां सर्वसिद्धी |
आघात अडथाळे उपाधी| बाधूं सकेना ||६||
जयाचें आठवितां ध्यान| वाटे परम समाधान |
नेत्रीं रिघोनियां मन| पांगुळे सर्वांगी ||७||
सगुण रूपाची टेव| माहा लावण्य लाघव |
नृत्य करितां सकळ देव| तटस्त होती ||८||
सर्वकाळ मदोन्मत्त| सदा आनंदे डुल्लत |
हरूषें निर्भर उद्दित| सुप्रसन्नवदनु ||९||
भव्यरूप वितंड| भीममूर्ति माहा प्रचंड |
विस्तीर्ण मस्तकीं उदंड| सिंधूर चर्चिला ||१०||
नाना सुगंध परिमळें| थबथबा गळती गंडस्थळें |
तेथें आलीं षट्पदकुळें| झुंकारशब्दें ||११||
मुर्डीव शुंडादंड सरळे| शोभे अभिनव आवाळें |
लंबित अधर तिक्षण गळे| क्षणक्ष्णा मंदसत्वी ||१२||
चौदा विद्यांचा गोसांवी| हरस्व लोचन ते हिलावी |
लवलवित फडकावी| फडै फडै कर्णथापा ||१३||
रत्नखचित मुगुटीं झळाळ| नाना सुरंग फांकती कीळ |
कुंडलें तळपती नीळ| वरी जडिले झमकती ||१४||
दंत शुभ्र सद्दट| रत्नखचित हेमकट्ट |
तया तळवटीं पत्रें नीट| तळपती लघु लघु ||१५||
लवथवित मलपे दोंद| वेष्टित कट्ट नागबंद |
क्षुद्र घंटिका मंद मंद| वाजती झणत्कारें ||१६||
चतुर्भुज लंबोदर| कासे कासिला पितांबर |
फडके दोंदिचा फणीवर| धुधूकार टाकी ||१७||
डोलवी मस्तक जिव्हा लाळी| घालून बैसला वेटाळी |
उभारोनि नाभिकमळीं| टकमकां पाहे ||१८||
नाना याति कुशुममाळा| व्याळपरियंत रुळती गळां |
रत्नजडित हृदयकमळा- | वरी पदक शोभे ||१९||
शोभे फरश आणी कमळ| अंकुश तिक्षण तेजाळ |
येके करीं मोदकगोळ| तयावरी अति प्रीति ||२०||
नट नाट्य कळा कुंसरी| नाना छंदें नृत्य करी |
टाळ मृदांग भरोवरी| उपांग हुंकारे ||२१||
स्थिरता नाहीं येक क्षण| चपळविशईं अग्रगण |
साअजिरी मूर्ति सुलक्षण| लावण्यखाणी ||२२||
रुणझुणा वाजती नेपुरें| वांकी बोभाटती गजरें |
घागरियासहित मनोहरें| पाउलें दोनी ||२३||
ईश्वरसभेसी आली शोभा| दिव्यांबरांची फांकली प्रभा |
साहित्यविशईं सुल्लभा| अष्टनायका होती ||२४||
ऐसा सर्वांगे सुंदरु| सकळ विद्यांचा आगरु |
त्यासी माझा नमस्कारु| साष्टांग भावें ||२५||
ध्यान गणेशाचें वर्णितां| मतिप्रकाश होये भ्रांता |
गुणानुवाद श्रवण करितां| वोळे सरस्वती ||२६||
जयासि ब्रह्मादिक वंदिती| तेथें मानव बापुडे किती |
असो प्राणी मंदमती| तेहीं गणेश चिंतावा ||२७||
जे मूर्ख अवलक्षण| जे कां हीणाहूनि हीण |
तेचि होती दक्ष प्रविण| सर्वविशईं ||२८||
ऐसा जो परम समर्थ| पूर्ण करी मनोरथ |
सप्रचीत भजनस्वार्थ| कल्लौ चंडीविनायेकौ ||२९||
ऐसा गणेश मंगळमूर्ती| तो म्यां स्तविला येथामति |
वांछ्या धरूनि चित्तीं| परमार्थाची ||३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे गणेशस्तवननाम
||दशक पहिला : स्तवननाम ||१|| समास पहिला: मंगलाचरण
समास पहिला : मंगलाचरण
||श्रीराम समर्थ ||
श्रोते पुसती कोण ग्रंथ| काय बोलिलें जी येथ |श्रवण केलियानें प्राप्त| काय आहे ||१||
ग्रंथा नाम दासबोध| गुरुशिष्यांचा संवाद |येथ बोलिला विशद| भक्तिमार्ग ||२||
नवविधा भक्ति आणि ज्ञान| बोलिलें वैराग्याचें लक्षण |बहुधा अध्यात्म निरोपण| निरोपिलें ||३||
भक्तिचेन योगें देव| निश्चयें पावती मानव | ऐसा आहे अभिप्राव| ईये ग्रंथीं ||४||
मुख्य भक्तीचा निश्चयो| शुद्धज्ञानाचा निश्चयो |आत्मस्थितीचा निश्चयो| बोलिला असे ||५||
शुद्ध उपदेशाचा निश्चयो| सायोज्यमुक्तीचा निश्चयो |मोक्षप्राप्तीचा निश्चयो| बोलिला असे ||६||
शुद्धस्वरूपाचा निश्चयो| विदेहस्थितीचा निश्चयो |अलिप्तपणाचा निश्चयो| बोलिला असे ||७||
मुख्य देवाचा निश्चयो| मुख्य भक्ताचा निश्चयो |जीवशिवाचा निश्चयो| बोलिला असे ||८||
मुख्य ब्रह्माचा निश्चयो| नाना मतांचा निश्चयो |आपण कोण हा निश्चयो| बोलिला असे ||९||
मुख्य उपासनालक्षण| नाना कवित्वलक्षण |नाना चातुर्यलक्षण| बोलिलें असे ||१०||
मायोद्भवाचें लक्षण| पंचभूतांचे लक्षण |कर्ता कोण हें लक्षण| बोलिलें असे ||११||
नाना किंत निवारिले ||नाना संशयो छेदिले |नाना आशंका फेडिले| नाना प्रश्न ||१२||
ऐसें बहुधा निरोपिलें| ग्रंथगर्भी जें बोलिलें |तें अवघेंचि अनुवादलें| न वचे किं कदा ||१३||
तथापि अवघा दासबोध| दशक फोडून केला विशद |जे जे दशकींचा अनुवाद| ते ते दशकीं बोलिला ||१४||
नाना ग्रंथांच्या समती| उपनिषदें वेदांत श्रुती |आणि मुख्य आत्मप्रचीती| शास्त्रेंसहित ||१५||
नाना समतीअन्वये| म्हणौनी मिथ्या म्हणतां न ये |तथापि हें अनुभवासि ये| प्रत्यक्ष आतां ||१६||
मत्सरें यासी मिथ्या म्हणती| तरी अवघेचि ग्रंथ उछेदती |नाना ग्रंथांच्या समती| भगवद्वाक्यें ||१७||
शिवगीता रामगीता| गुरुगीता गर्भगीता |उत्तरगीता अवधूतगीता| वेद आणी वेदांत ||१८||
भगवद्गीता ब्रह्मगीता| हंसगीता पाण्डवगीता |गणेशगीता येमगीता| उपनिषदें भागवत ||१९||
इत्यादिक नाना ग्रंथ| समतीस बोलिले येथ |भगवद्वाक्ये येथार्थ| निश्चयेंसीं ||२०||
भगवद्वचनीं अविश्वासे| ऐसा कोण पतित असे |भगवद्वाक्याविरहित नसे| बोलणे येथीचें ||२१||
पूर्णग्रंथ पाहिल्याविण| उगाच ठेवी जो दूषण |तो दुरात्मा दुराभिमान| मत्सरें करी ||२२||
अभिमानें उठे मत्सर| मत्सरें ये तिरस्कार |पुढें क्रोधाचा विकार| प्रबळे बळें ||२३||
ऐसा अंतरी नासला| कामक्रोधें खवळला |अहंभावे पालटला| प्रत्यक्ष दिसे ||२४||
कामक्रोधें लिथाडिला| तो कैसा म्हणावा भला |अमृत सेवितांच पावला| मृत्य राहो ||२५||
आतां असो हें बोलणें| अधिकारासारिखें घेणें |परंतु अभिमान त्यागणें| हें उत्तमोत्तम ||२६||
मागां श्रोतीं आक्षेपिलें| जी ये ग्रंथीं काय बोलिलें |तें सकळहि निरोपिलें| संकळीत मार्गे ||२७||
आतां श्रवण केलियाचें फळ| क्रिया पालटे तत्काळ |तुटे संशयाचें मूळ| येकसरां ||२८||
मार्ग सांपडे सुगम| न लगे साधन दुर्गम |सायोज्यमुक्तीचें वर्म| ठांइं पडे ||२९||
नासे अज्ञान दुःख भ्रांती| शीघ्रचि येथें ज्ञानप्राप्ती |ऐसी आहे फळश्रुती| ईये ग्रंथीं ||३०||
योगियांचे परम भाग्य| आंगीं बाणे तें वैराग्य |चातुर्य कळे यथायोग्य| विवेकेंसहित ||३१||
भ्रांत अवगुणी अवलक्षण| तेंचि होती सुलक्षण |धूर्त तार्किक विचक्षण| समयो जाणती ||३२||
आळसी तेचि साक्षपी होती| पापी तेचि प्रस्तावती |निंदक तेचि वंदूं लागती| भक्तिमार्गासी ||३३||
बद्धची होती मुमुक्ष| मूर्ख होती अतिदक्ष |अभक्तची पावती मोक्ष| भक्तिमार्गें ||३४||
नाना दोष ते नासती| पतित तेचि पावन होती |प्राणी पावे उत्तम गती| श्रवणमात्रें ||३५||
नाना धोकें देहबुद्धीचे| नाना किंत संदेहाचे |नाना उद्वेग संसाराचे| नासती श्रवणें ||३६||
ऐसी याची फळश्रुती| श्रवणें चुके अधोगती |मनास होय विश्रांती| समाधान ||३७||
जयाचा भावार्थ जैसा| तयास लाभ तैसा |मत्सर धरी जो पुंसा| तयास तेंचि प्राप्त ||३८||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे : मंगलाचरणनाम समास पहिला ||१||१. १
||श्रीराम समर्थ ||
श्रोते पुसती कोण ग्रंथ| काय बोलिलें जी येथ |श्रवण केलियानें प्राप्त| काय आहे ||१||
ग्रंथा नाम दासबोध| गुरुशिष्यांचा संवाद |येथ बोलिला विशद| भक्तिमार्ग ||२||
नवविधा भक्ति आणि ज्ञान| बोलिलें वैराग्याचें लक्षण |बहुधा अध्यात्म निरोपण| निरोपिलें ||३||
भक्तिचेन योगें देव| निश्चयें पावती मानव | ऐसा आहे अभिप्राव| ईये ग्रंथीं ||४||
मुख्य भक्तीचा निश्चयो| शुद्धज्ञानाचा निश्चयो |आत्मस्थितीचा निश्चयो| बोलिला असे ||५||
शुद्ध उपदेशाचा निश्चयो| सायोज्यमुक्तीचा निश्चयो |मोक्षप्राप्तीचा निश्चयो| बोलिला असे ||६||
शुद्धस्वरूपाचा निश्चयो| विदेहस्थितीचा निश्चयो |अलिप्तपणाचा निश्चयो| बोलिला असे ||७||
मुख्य देवाचा निश्चयो| मुख्य भक्ताचा निश्चयो |जीवशिवाचा निश्चयो| बोलिला असे ||८||
मुख्य ब्रह्माचा निश्चयो| नाना मतांचा निश्चयो |आपण कोण हा निश्चयो| बोलिला असे ||९||
मुख्य उपासनालक्षण| नाना कवित्वलक्षण |नाना चातुर्यलक्षण| बोलिलें असे ||१०||
मायोद्भवाचें लक्षण| पंचभूतांचे लक्षण |कर्ता कोण हें लक्षण| बोलिलें असे ||११||
नाना किंत निवारिले ||नाना संशयो छेदिले |नाना आशंका फेडिले| नाना प्रश्न ||१२||
ऐसें बहुधा निरोपिलें| ग्रंथगर्भी जें बोलिलें |तें अवघेंचि अनुवादलें| न वचे किं कदा ||१३||
तथापि अवघा दासबोध| दशक फोडून केला विशद |जे जे दशकींचा अनुवाद| ते ते दशकीं बोलिला ||१४||
नाना ग्रंथांच्या समती| उपनिषदें वेदांत श्रुती |आणि मुख्य आत्मप्रचीती| शास्त्रेंसहित ||१५||
नाना समतीअन्वये| म्हणौनी मिथ्या म्हणतां न ये |तथापि हें अनुभवासि ये| प्रत्यक्ष आतां ||१६||
मत्सरें यासी मिथ्या म्हणती| तरी अवघेचि ग्रंथ उछेदती |नाना ग्रंथांच्या समती| भगवद्वाक्यें ||१७||
शिवगीता रामगीता| गुरुगीता गर्भगीता |उत्तरगीता अवधूतगीता| वेद आणी वेदांत ||१८||
भगवद्गीता ब्रह्मगीता| हंसगीता पाण्डवगीता |गणेशगीता येमगीता| उपनिषदें भागवत ||१९||
इत्यादिक नाना ग्रंथ| समतीस बोलिले येथ |भगवद्वाक्ये येथार्थ| निश्चयेंसीं ||२०||
भगवद्वचनीं अविश्वासे| ऐसा कोण पतित असे |भगवद्वाक्याविरहित नसे| बोलणे येथीचें ||२१||
पूर्णग्रंथ पाहिल्याविण| उगाच ठेवी जो दूषण |तो दुरात्मा दुराभिमान| मत्सरें करी ||२२||
अभिमानें उठे मत्सर| मत्सरें ये तिरस्कार |पुढें क्रोधाचा विकार| प्रबळे बळें ||२३||
ऐसा अंतरी नासला| कामक्रोधें खवळला |अहंभावे पालटला| प्रत्यक्ष दिसे ||२४||
कामक्रोधें लिथाडिला| तो कैसा म्हणावा भला |अमृत सेवितांच पावला| मृत्य राहो ||२५||
आतां असो हें बोलणें| अधिकारासारिखें घेणें |परंतु अभिमान त्यागणें| हें उत्तमोत्तम ||२६||
मागां श्रोतीं आक्षेपिलें| जी ये ग्रंथीं काय बोलिलें |तें सकळहि निरोपिलें| संकळीत मार्गे ||२७||
आतां श्रवण केलियाचें फळ| क्रिया पालटे तत्काळ |तुटे संशयाचें मूळ| येकसरां ||२८||
मार्ग सांपडे सुगम| न लगे साधन दुर्गम |सायोज्यमुक्तीचें वर्म| ठांइं पडे ||२९||
नासे अज्ञान दुःख भ्रांती| शीघ्रचि येथें ज्ञानप्राप्ती |ऐसी आहे फळश्रुती| ईये ग्रंथीं ||३०||
योगियांचे परम भाग्य| आंगीं बाणे तें वैराग्य |चातुर्य कळे यथायोग्य| विवेकेंसहित ||३१||
भ्रांत अवगुणी अवलक्षण| तेंचि होती सुलक्षण |धूर्त तार्किक विचक्षण| समयो जाणती ||३२||
आळसी तेचि साक्षपी होती| पापी तेचि प्रस्तावती |निंदक तेचि वंदूं लागती| भक्तिमार्गासी ||३३||
बद्धची होती मुमुक्ष| मूर्ख होती अतिदक्ष |अभक्तची पावती मोक्ष| भक्तिमार्गें ||३४||
नाना दोष ते नासती| पतित तेचि पावन होती |प्राणी पावे उत्तम गती| श्रवणमात्रें ||३५||
नाना धोकें देहबुद्धीचे| नाना किंत संदेहाचे |नाना उद्वेग संसाराचे| नासती श्रवणें ||३६||
ऐसी याची फळश्रुती| श्रवणें चुके अधोगती |मनास होय विश्रांती| समाधान ||३७||
जयाचा भावार्थ जैसा| तयास लाभ तैसा |मत्सर धरी जो पुंसा| तयास तेंचि प्राप्त ||३८||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे : मंगलाचरणनाम समास पहिला ||१||१. १
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